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हरित गृह प्रभाव

पृथ्वी के वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑकसाइड, मिथेन तथा नाइट्रस ऑकसाइड गैसें दीर्घ तरंग दैर्ध्य वाली ताप विकिरणों को वायुमंडल से बाहर नहीं जाने देती| इस कारण तापमान में वृद्धि हो जाती है| इस तरह तापमान में वृद्धि होने को हरित गृह प्रभाव कहते हैं| प्राकृतिक रूप से हरित गृह प्रभाव से पृथ्वी के वायुमंडल का तापक्रम सामान्य रहता है| ऐसे ठंठे प्रदेशों में जहां पोधों को उचित तापमान नहीं मिला पाता वहां पौधों को उचित तापमान देने के लिए कांच के हरित गृहों का निर्माण किया जाता है|

प्रदूषण के बढ़ने से वायुमंडल में हरित गृह प्रभाव को बढाने वाली गैसों में वृद्धि हुई जिसके कारण पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हुई है| अध्ययनों से यह मालुम हुआ है कि पृथ्वी की सतह का औसत तापमान पिछले 100 वर्षों में 0.8 °C बढ़ गया है| तापमान बढ़ जाने से महासागरों का तापीय विस्तार हो गया है जिसके कारण सागर जल के स्तर में 12 से 27 सेंटीमीटर कि वृद्धि हो गयी है| अगर इसी तरह से महासगरों का तापीय विस्तार होता गया तो जल चक्र पर कुप्रभाव पड़ने की आशंका है और जल चक्र के असंतुलन होने पर पूरे पारितंत्र के चक्र पर भी कुप्रभाव पड़ेगा|

वर्ष 1997 में क्योटो प्रोटोकोल के अधीन 6 हरित गृह गैसों की पहचान की  गयी थी| ये गैसे हैं कार्बन डाइऑकसाइड, मिथेन, नाइट्रस, ऑकसाइड, हाइड्रफ्लो कार्बन, परफ्लोरो कार्बन, ओजोन, तथा सल्फर हेक्साफ्लोराइड|
इन गैसों में कार्बन डाईऑक्साइड, मिथेन, नाइट्रस ऑक्साइड तथा ओजोन प्राकृतिक गैसे हैं| कार्बन डाईऑक्साइड ठोस अपशिष्टों, जीवाश्म इधनों जैसे तेल, कोयला, प्राकृतिक गैस आदि के जलने से उत्पन्न होती है| मिथेन गैस पशुपालन की अभिक्रियाओं तथा ठोस नगरीय कार्बनिक अवशिष्टों के अपघटन (Decomposition) से उत्पन्न होती है| नाइट्रस ऑक्साइड कृषि एवं औद्योगिक गतिविधियों, ठोस अपशिष्टों तथा जीवाश्म इधनों के जलने से विमुक्त होती है| मानव द्वारा होने वाली गतिविधियों से हाइड्रोफ्लोरोकार्बन, परफ्लोरोकार्बन तथा सल्फर हेक्साफ्लोराइड है|

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